दीपावली के लिए दीपक बनाने में जुटे मिट्टी के कारीगर
By Team Lohardaga live

आधुनिक रोशनी के बीच परंपरा को जीवित रख रहे हैं, दीया शिल्पी
लोहरदगा/भंडरा। दुर्गा पूजा समाप्त होते ही अब दीपावली की तैयारियाँ पूरे जोर पर हैं। त्योहारों के इस मौसम में जहाँ शहरों में बिजली की झिलमिल रोशनी सजावट का केंद्र बन गई है, वहीं ग्रामीण इलाकों में अब भी मिट्टी के दीयों की परंपरा जीवित है। अंधकार को दूर करने और घरों में शुभता लाने के प्रतीक इन दीयों की मांग दीपावली के करीब आते ही तेजी से बढ़ जाती है।
भंडरा प्रखंड के भौंरो, अम्बेरा, कचमची समेत कई गांवों के कुम्हार इन दिनों दिन-रात दीपक, पूजा घाट और अन्य मिट्टी की वस्तुएँ बनाने में जुटे हैं। स्थानीय कारीगर शिव प्रजापति बताते हैं कि दिवाली के समय उनके उत्पादों की मांग बढ़ जाती है, लेकिन आधुनिक रोशनी और मोमबत्तियों के प्रचलन ने मिट्टी के दीयों की बिक्री पर असर डाला है।
उन्होंने बताया कि हम पिछले 30 साल से यह काम कर रहे हैं। पहले दीयों की खूब मांग रहती थी, पर अब बिजली की रोशनी और सजावटी लाइटों ने जगह ले ली है। कच्चे माल की कीमत बढ़ गई है और मुनाफा पहले जैसा नहीं रहा, जिससे परिवार का गुज़ारा मुश्किल हो गया है।
एक अन्य कारीगर ने बताया कि वे सुबह से शाम तक लगातार काम कर रहे हैं ताकि इस बार काली पूजा और दीपावली के लिए करीब तीन हजार दीये तैयार कर सकें। उनका कहना है कि आज भी कुछ घर ऐसे हैं जो परंपरागत दीयों से ही घर रोशन करना पसंद करते हैं, यही उन्हें इस पेशे से जोड़े रखता है।
भले ही मिट्टी के दीयों की चमक आधुनिक रोशनी के सामने फीकी पड़ रही हो, लेकिन इन कारीगरों की मेहनत और उम्मीदें अब भी जलती हुई लौ की तरह कायम हैं। उन्हें विश्वास है कि इस दिवाली उनके हाथों से बने ये पारंपरिक दीये लोगों के जीवन में उजाला भरेंगे।
