लोहरदगा में पेसा कानून और डीलिस्टिंग पर तेज हुई बहस, निशा उरांव ने उपायुक्त को सौंपा मांग पत्र
By Team Lohardaga live

पारंपरिक आदिवासी व्यवस्था के अनुरूप लागू हो पेसा कानून, डीलिस्टिंग से सरना समाज को मिलेगा लाभ : निशा उरांव
लोहरदगा। झारखंड में पेसा कानून और डीलिस्टिंग के मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। इसी क्रम में राज्य की पूर्व कृषि निदेशक सह आईआरएस अधिकारी निशा उरांव लोहरदगा पहुंचीं। ‘आदिवासी पारंपरिक बहुस्तरीय व्यवस्था मंच’ के बैनर तले बड़ी संख्या में ग्रामीणों के साथ उन्होंने समाहरणालय पहुंचकर उपायुक्त संदीप कुमार मीना को एक मांग पत्र सौंपा।
सौंपे गए ज्ञापन में मंच की ओर से मांग की गई कि जिले में पेसा कानून को आदिवासी समाज की पारंपरिक रूढ़िवादी व्यवस्था और ग्राम प्रधान प्रणाली के अनुरूप लागू किया जाए। मंच का कहना है कि कानून के क्रियान्वयन में आदिवासी परंपराओं और सामाजिक संरचना का सम्मान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इस अवसर पर निशा उरांव ने कहा कि पेसा कानून का मूल उद्देश्य आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा करना है। इसलिए इसे उसकी मूल भावना के अनुरूप धरातल पर उतारा जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ग्राम शासन व्यवस्था को मजबूत किए बिना पेसा कानून का वास्तविक लाभ आदिवासी समाज तक नहीं पहुंच सकेगा।
डीलिस्टिंग के मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए निशा उरांव ने इसका समर्थन किया। उन्होंने कहा कि डीलिस्टिंग से सरना आदिवासियों को सीधा लाभ मिलेगा और उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी। उनका कहना था कि इससे आदिवासी पूजा-पद्धति, परंपराओं और मान्यताओं के संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
निशा उरांव ने यह भी कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आरक्षण का अधिक लाभ धर्मांतरित आदिवासियों को मिल रहा है, जबकि सरना समुदाय के कई युवा पीछे छूट रहे हैं। उनके अनुसार डीलिस्टिंग लागू होने से आदिवासी समाज की मूल पहचान सुरक्षित रहेगी और समुदाय के समग्र विकास को गति मिलेगी।
ज्ञापन सौंपने के दौरान मंच से जुड़े पदाधिकारी, पारंपरिक ग्राम प्रधान तथा विभिन्न गांवों से आए बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण मौजूद थे।
