पझरी पहाड़ की माघ जतरा : सदियों पुरानी आस्था का विराट उत्सव
By Team Lohardaga live


लोहरदगा। जिले के भंडरा प्रखंड अंतर्गत पझरी गांव स्थित ऐतिहासिक पझरी पहाड़ पर मंगलवार को माघ जतरा महोत्सव 2026 पूरे श्रद्धा, परंपरा और सांस्कृतिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। हजारों वर्षों से चली आ रही इस लोक-आस्था के महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक उमड़े, जिससे पूरा क्षेत्र जनसैलाब में तब्दील हो गया।
छोटी पहल से बना ऐतिहासिक आयोजन
कभी समय के साथ लुप्तप्राय हो चुकी माघ जतरा की परंपरा को वर्ष 2016–17 में कुछ जागरूक ग्रामीणों ने पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया था। उस समय मात्र 5–6 लोगों की बैठक से शुरू हुआ यह प्रयास आज जिला स्तर के बड़े सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले चुका है।
बिंदेश्वर उराँव, भुनेश्वर उराँव, एतवा उराँव, बिरेन्द्र उराँव और धन्नो उराँव जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर इस परंपरा को दोबारा समाज के केंद्र में लाने का निर्णय लिया, जिसका प्रत्यक्ष परिणाम आज देखने को मिला।
जनमानस से जुड़ी परंपरा : बिंदेश्वर उराँव
महोत्सव के अवसर पर बिंदेश्वर उराँव ने कहा कि पझरी पहाड़ की माघ जतरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की अस्मिता, प्रकृति-पूजा और सामूहिक चेतना का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि जब समाज अपनी परंपराओं को सहेजता है, तो इतिहास स्वयं जीवंत हो उठता है। एक दशक पहले शुरू हुआ छोटा प्रयास आज हजारों लोगों की साझा आस्था बन चुका है।
नृत्य, वाद्य और रंगों से सजा पझरी पहाड़
सुबह से ही दूर-दराज के गांवों से पारंपरिक नृत्य दल, ढोल-नगाड़ा, गाजा-बाजा और कलसा के साथ जुलूस पझरी पहाड़ की ओर बढ़ते नजर आए। पारंपरिक वेशभूषा में सजे पुरुष, महिलाएं और युवक-युवतियों के सामूहिक नृत्य ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया।
यह दृश्य झारखंड की समृद्ध आदिवासी लोक-संस्कृति की जीवंत प्रस्तुति था।
पहान परंपरा के अनुसार हुआ पवित्र अनुष्ठान
माघ जतरा के दौरान पहान (परंपरागत ग्राम पुजारी) के नेतृत्व में पहाड़ की चोटी पर विधिवत मुर्गी पूजा संपन्न हुई। ग्राम-देवता को समर्पित इस पूजा में अच्छी फसल, सुख-शांति, स्वास्थ्य और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की कामना की गई।
पूरे समाज की सहभागिता ने इस धार्मिक अनुष्ठान को और अधिक गरिमामय बना दिया।
लोककथाओं से जुड़ा पझरी पहाड़ का महत्व
लोकमान्यताओं के अनुसार पझरी पहाड़ ग्राम-देवता की प्राचीन तपोभूमि रही है। मान्यता है कि माघ मास में यहां सामूहिक पूजा से गांव में समृद्धि आती है और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
माघ जतरा चाला अयंग तथा महादेव-पार्वती की पौराणिक कथा से भी जुड़ी है। कथा के अनुसार महादेव ने बाल रूप में भेष बदलकर चाला अयंग के यहां धांगर के रूप में कार्य किया था और इसी दिन उन्हें मुक्ति मिली थी। चाला अयंग के गोहाल में गोबर का सोने-सा चमकना इसी कथा से जुड़ा माना जाता है। जतरा से एक दिन पहले जलाया जाने वाला कुम्बा उसी सोने का प्रतीक माना जाता है।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मजबूत संदेश
पझरी पहाड़ माघ जतरा महोत्सव 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब समाज उन्हें अपनी पहचान मानकर आगे बढ़ाता है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी सिद्ध हुआ।
जतरा आयोजन में अभिनव सिद्धार्थ भगत, बिंदेश्वर उराँव, भुनेश्वर उराँव, बिनय उराँव, एतवा उराँव, बीरेंद्र उराँव, महेश उराँव, परमेश्वर महली, इंद्रदेव उराँव, सुमित उराँव, बबलू उराँव, जगजीवन उराँव, महादेव पहान, पुणय उराँव, महादेव मुंडा, प्रमोद उराँव, सुरेंद्र उराँव सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण व सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
