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कार्तिक उरांव जयंती पर विशेष

By Teem Lohardaga live

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स्व. कार्तिक उरांव

झारखंड की धरती ने ऐसे अनेक सपूत दिए हैं जिन्होंने अपनी मेहनत, संघर्ष और संकल्प से समाज को नई दिशा दी। इनमें एक नाम है- कार्तिक उरांव। वे सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, शिक्षा और स्वाभिमान के प्रतीक थे। 29 अक्तूबर को पूरे प्रदेश में उनकी जयंती श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है।

कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्तूबर 1924 को गुमला जिले के करमटोली गांव में हुआ था। बचपन से ही पढ़ाई के प्रति गहरी रुचि थी। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी लगन के बल पर इंग्लैंड की प्रसिद्ध कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। उस दौर में किसी आदिवासी युवक का विदेश जाकर पढ़ाई करना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने विदेश में नौकरी करने के बजाय अपने देश लौटना उचित समझा। उनका मानना था कि अपने ज्ञान और अनुभव का उपयोग अपने समाज की सेवा में होना चाहिए। भारत लौटकर उन्होंने आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए खुद को समर्पित कर दिया।

वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और कई बार सांसद बने। केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में भी उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने बार-बार कहा कि विकास तभी सार्थक है जब वह अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ा हो। उनके प्रयासों से शिक्षा, रोजगार, भूमि सुधार और वनाधिकार जैसे विषयों पर सरकार की नीतियों में नई सोच आई।

कार्तिक उरांव का जीवन एक संदेश देता है कि मेहनत, शिक्षा और आत्मविश्वास से कोई भी समाज आगे बढ़ सकता है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि आदिवासी समाज को अपनी परंपरा और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए, क्योंकि यही उसकी असली ताकत है।

आज उनकी जयंती के अवसर पर पूरे झारखंड में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। स्कूलों और कॉलेजों में उनके जीवन पर चर्चा की जा रही है, रैलियाँ निकाली जा रही हैं और उनके योगदान को याद किया जा रहा है।

कार्तिक उरांव सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि जनसेवक थे जिन्होंने समाज के कमजोर तबके के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज जब हम समावेशी विकास और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तो कार्तिक उरांव के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।

उनकी जयंती हमें यह याद दिलाती है कि बदलाव शिक्षा और आत्मविश्वास से ही संभव है। कार्तिक उरांव ने जो सपना देखा था एक शिक्षित, सशक्त और आत्मनिर्भर समाज का उसे साकार करना हम सबकी जिम्मेदारी है।